कमल – शिशिर मधुकर

गुल कमल के तू कहाँ कीचड़ में खिल गया
तेरे हुस्न का रुआब सब मिट्टी में मिल गया

कपड़ा वो बड़ा कीमती अनजान को मिला
देखो लिबास सारा ये उल्टा ही सिल गया

मिट्टी नरम थी बाग की जहाँ बीज बो दिया
तूफां चला तो पेड़ देखो जड़ से हिल गया

हाथों में हाथ पकड़ा ना उसने सहूर से
थोड़ी सी खींच तान में ये सारा छिल गया

ताजा हवा जीने की जो मधुकर नहीं मिले
ऐसी जगह इंसान का बैठा है दिल गया

शिशिर मधुकर

4 Comments

  1. vijaykr811 vijaykr811 20/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/03/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 22/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/03/2019

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