संदल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

संदल

संदल वन को महकते देखा
संदली रंग चमकते देखा।
कुंदन – कुंदन सा लगता है
बसंती हवा बहकते देखा।।

तपो भूमि की जैसी लगती
चह – चह चिड़ा चहकते देखा।
आँख मिचोली करते आई
लुप्त गौरैया फुदकते देखा।।

अंतर मन खुशियों से जागा
मोरनी – मोर मचलते देखा।
प्रेम का अद्भुत यहाँ नजारा
नहीं किसी को भटकते देखा।।

यहाँ बसंत है झूम के आया
डाली – डाली लचकते देखा।
यहाँ भी देखो फुलवारी है
अपना ये मन बहलते देखा।।

सुर कोकिल की कितनी प्यारी
जिगर में उसे मटकते देखा।
विरहन को तो मत पूछिए
करवट उसे बदलते देखा।।

कली – कली,फूल – फूल पर
तितलियों को फिसलते देखा।
भौरों को भी क्या कहना है
रह – रह कर उसे ठुमकते देखा।।

संदल – चंदन

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 19/03/2019
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 19/03/2019

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