मेरा मन तर नहीं होता – शिशिर मधुकर

अगर दीवानगी होती तो फिर ये डर नहीं होता
तुम भी तन्हा नहीं रहते सूना ये घर नहीं होता

मैं तो मुद्दत से प्यासा हूँ आस बारिश की रखता हूँ
फ़कत कुछ बूँद गिरने से मेरा मन तर नहीं होता

हाथ पकड़ा था गर तुमने हाथ को थाम के रखते
अगर तुम साथ में रहते झुका ये सर नहीं होता

मैं तो मशगूल था खुद में सफ़र में कारवां के संग
कब का आगे निकल जाता जो तेरा दर नहीं होता

उड़ानों की तमन्ना थीं मगर कुछ भी ना कर पाए
दिखा देते तुम्हें मधुकर कटा जो पर नहीं होता

शिशिर मधुकर

6 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 14/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2019
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2019
  3. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 16/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/03/2019

Leave a Reply