वक्त का क्या पता – शिशिर मधुकर

जवानी सबकी ढल जाएगी ज्यों ही शाम आएगी
तेरे इस रूप की मय देख फिर ना काम आएगी

महल इतना भी ऊँचा ना बना अपनी हिफाजत को
ज़िन्दगी जीने की खातिर कहाँ से घाम आएगी

वक्त का क्या पता किसको कौन सी करवटें बदले
ढूंढ़ती फिर शहर में तू भी मेरा नाम आएगी

नहीं क्यों तुमने समझाया वक्त रहते यहाँ मुझको
लगाती मुझपे फिर एक बार तू इल्जाम आएगी

भले ही आज दूरी हों मगर उम्मीद है मुझको
एक दिन फिर तू मधुकर का करने एहतराम आएगी

शिशिर मधुकर

5 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 14/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2019
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2019
      • डी. के. निवातिया dknivatiya 14/03/2019

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