सक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

सक में स्वभाव बदल जाता
वक्त ऐसे यह निकल जाता।

बात की तह तक जाता कौन
आदमी ऐसे फिसल जाता।

समझा भी तो देर हो गयी
बाँझ पेड़ भी यह फल जाता।

इंसान हम भी काम के होते
कड़वी घूँट जो निगल जाता।

रिश्ता दिलों का बना रहता
दिल जो बिन्दु का पिघल जाता

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 13/03/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 14/03/2019

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