याद आती है वो

आज भी रहती है वो
मेरे जेहन में
पर उसका जिक्र अब
लबो पर मौजूद नहीं रहता
देख लेता हूँ आज भी
यादों के आईने में
पर उसका अक्स अब
किसी दीवार पर नहीं ठहरता
जितना कुरेदता हूँ खुद को
उतना उभरती है वो
जितना उजाड़ता हूँ खुद को
उतना सँवरती है वो
जितनी दफा मिटाना चाहा
उसकी यादों को
उतनी दफा ठहर जाती है वो
उसकी यादों के संग
याद आ जाता है उसके साथ बिताया
हर एक पल
और मैं फिर से बहने लगता हूँ
भावनाओ के समंदर में
आखिर किसी किनारे फिर से
मुझे मिल जाए वो–अभिषेक राजहंस

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/03/2019

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