जाने कहाँ से आई थी वो

पता नहीं क्यों आई थी वो
न जाने कहाँ से आई थी वो
मुझे मेरे होने का एहसास कराने
मैं क्या हूँ
या फिर मैं क्या हो सकता हूँ
मुझे ये बताने
न जाने कहाँ से आई थी वो
मैं तो फकीर हो चला था
पर मेरी किस्मत की लकीर
बन कर आई थी वो
इस बदनसीब का
नसीब बन कर आई थी वो
पिछले कुछ लम्हो में उसने
बहुत कुछ दिया था मुझे
मुझ पर भरोसा कर
मेरे भरोसे को जिंदा किया था उसने
वो चुपके से आ गयी थी
बिना दरवाजा खटखटाये
और अब जो आ गयी है
तो उसे जाने देने को मन नहीं करता
उसके साथ और कुछ पल बाँट सकूं
मेरे लिए उसने माँगी है खुशियाँ
उसके ग़म भी कुछ कम कर सकूँ
बस उसके लिए
चंद साँसे और उस रब से चाहता हूँ
उसके जन्मदिन पर
भले कुछ दे ना पाऊँ
पर अपनी साँसो के कुछ हिस्से
उसके नाम करना चाहता हूँ
जुगनू बन कर
उसकी जिंदगी में रौशनी करना चाहता हूँ
उसे किसी की नजर न लगे
इसलिए उसकी आँखों का काजल बनना चाहता हूँ
-अभिषेक राजहंस

Leave a Reply