रचनाएँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

बिजली चमकती जैसे आसमान का
आईना बन गया लफ्ज़ इंसान का।

हर चेहरे से परेशाँ है क्यों आदमी
कोई मिलता नहीं अब पहचान का।

ऐसा कोई नहीं पढ़ सके आदमी
दुश्मन घूम रहा कौन किस जान का।

चोर डाकू या साधु कौन जानता
लोग लेते हैं बदला अपमान का।

फरेबों की दुनिया हरकतों से भरी
काम करते हैं ऐसे शैतान का।

घिर से गये लोग नफरतों के बीच
हरकतों के बीच क्या रहा जुबान का।

2

उद्वेलित आक्रोशित हुए, हर तपके के लोग
रख दिया झकझोर कर, करनी का फल भोग।

जिहादी बदनाम किया, है पापी पाकिस्तान
गाली देकर बोल रहा , तुझको बलूचिस्तान।

इन सबको लग गया, आतंकवाद का रोग
फर्ज भूल गये इंसान का, कैसे रहे निरोग।

आतंक फैलाना काम है, मिलते उसके दाम
आकाओं के ही चाल पर, दे जाते अंजाम।

ना जाने इस कौम में , हैं कितने कट्टरवाद
जितने कट्टरवाद हैं , सब के सब उन्माद।

उन्माद – पागलपन – सनक,

3

वर्षो से दिल में जलते शोलों को बुझा दिया
मुश्किल भी बता दी और हल भी सुझा दिया।

बे हिचक आप अपने काम में लग जाइये
अड़चनें सारे आपके जड़ से सुलझा दिया।

घबराने की बात बहुत दूर की हो गयी
जिससे डर लगा था उसको भी उलझा दिया।

जिंदगी संवारने का मौका मुबारक हो
जो झगड़ रहे थे उसे उसी में जुझा दिया।

अपने आप को तीस मार खाँ सभझते थे
उसे हमनें एक झटके में ही मुरझा दिया।

4

पुलवामा से दहल गया, पूरा विश्व एक साथ
हृदय विदारक है घटना, सैनिक हुए आघात।
आतंकी हमले में होती , इस तरह की रार
जब लड़ने की कोशिश करते, तब जाते वो हार।

5

चिथड़े – चिथड़े उड़ गये, खून की बह गयी नदियाँ
फूट पड़ा ज्वालामुखी , दहल गयी सब सदियाँ।

कैसा षडयंत्र है तेरा ,वार पीठ पर करने का
डर लगता क्यों तुमको, सामने आकर मरने का।

पुलवामा में हरकत से , तुमने आग लगाई
अजहर मसूद अपने , दामन में दाग लगाई।

छुपे हो पाक में जाकर, बुजदिलों के डेरे में
आ गयी तुझ पे सामत , फंस गये अब घेरे में।

तुम जैसा मुल्ला साथी , सब मारे जाओगे
अंतरराष्ट्र घेरे से ,नहीं तुम बच पाओगे ।

माता का दिल विरक्त हुआ , और ममता रोई है
बाप विषाद में डूबा, पत्नी – पति को खोई है।

बादा करके चल दिये , होली में घर आऊँगा
अपने मुन्ना, बहना का, तौफा नया ले आऊँगा।

प्रीतम की इक याद लिये, सैनिक वीर चला गया
घर के एक छलिया से, वीर सिपाही छला गया।

बंधन – क्रंदना में है डूबा , अपना हिन्दुस्तान
बदला चून – चून कर लेगा, सुनो खोलकर कान।

6

गद्दारों को फांसी दे दो, भीतर  घात  जो  करते हैं
अपने वतन के  खाते हैं , गले दुश्मन  के लगते हैं।
सबसे पहले घर को देखो, युद्ध फिर तुम कर लेना
छुपे कहाँ हैं ऐसे शातिर, उसका  पंख  कुतर  देना।

किस खेत की मूली है पाक , भीख से काम चलाता है
तंगहाल है जीवन  उसका , मांग – मांग  कर खाता है।
नंगा – भूखा बोलेगा क्या , छुप  कर वार कर जाता है
आतंकवाद पनाह  लेता हैं ,  एक – एक  मर  जाता है।

हर  बार  कष्ट  दिलाते  हो , हर  बार  तुझे  बचाते  हैं
अपना अंग समझ कर तुझको, अपना धर्म निभाते हैं।
बाज नहीं आदत से आते , अब तो कुछ  करना होगा
जितना तुम लगाओ ताकत, अब तुमको  मरना होगा।

चिंगारी बन गया शोला, जला  कर  भस्म कर डालेंगे
हर बार मुँह की खाया है, इस  बार  कसर  निकालेंगे।
आते नहीं  सामने क्यों तुम , लेकर  हिजड़ेे  फौज को
गीदड़ – चूहे से बत्तर हो, क्या नहीं जानते  नौज  को।

माथे की चमकती  बिंदिया, मांग सिंदूरी कहाँ गयी
आँसू संग बहते ये कज़रा, चूड़ा – कंगन कहाँ गयी।
है खामोश हिंद हमारा, रग – रग में गुस्सा छाया है
कुछ करने को सोच रहा, इस बार देख बौराया है।

बार – बार की गीदड़ भभकी, भारी पड़ने वाला है
दुनिया के अब मानचित्र से, पाक ये हटने वाला है।
शंखनाद बजनेे  वाला  है, नींद  तेरा  उड़  जायेगा
सुनो पाक के  मुल्लाओं , ईंट  से ईंट  बज जायेगा।

सेना  के  ये  वीर   सिपाही  , चून  – चून   कर   मारेंगे
दफ़न  नसीब  नहीं  होगा ,  अब  धरती  पर ही जारेंगे।
माँ  की  ममता  रोई  है , बहनों  से  भाई    बिछड़ा  है
पत्नी पागल बन गयी, बाप  का आशियाना  उजड़ा है।

7

सूरत – ए – हाल बदल गये
जवानी मे चाल बदल गये।

क्या भली अच्छी लड़की थी
ख्याल – ए- मिसाल बदल गये।

शिकायत नहीं थी दूर तलक
सुर उसके ताल बदल गये।

मची धुन चौक चौराहों पर
मुद्रा वही टकसाल बदल गये।

दिवाने फिराक में थे उसके
भेड़िया वही छाल बदल गये।

वहम में बहुत धोखे खाये
दिन वही पर साल बदल गये।

हर रोज सजती थीं दुकानें
मंडी वही दलाल बदल गये।

8

चूड़ी रोयी – रोया कंगना, बिंदी माथ की गिर गयी अंगना
सुहागन की सिंदूर लुटा है, चित विह्वल से करती क्रंदना।

सूनी हाथों की मेहदी है , बिखर गये चूड़े की गज़रा
अस्त – व्यस्त ये तन के कपड़े, बह रही आँखों की कज़रा।

माँ की देखो गोद लुट गयी , बाप. का भी छिन गया सहारा
बहन अब मजबूर हो गयी , बह रहा अब आँसुओं की घारा।

बच्चे उनके बिलख रहे हैं, घर आंगन सब सिसक रहे हैं
हालत हुए खराब सभी के, अपने आप में सिमट रहे हैं।

तिरंगे में आया जब अर्थी , ऐसा लगा पहाड़ टूट गया
मच गयी हाहाकार सी ,अपने खून का साथ छूट गया।

यह कैसा बलिदान है भाई ? जो हर बार मुसीबत लाता है
कर नहीं कुछ हम सब पाते , वो तब इतना इतराता है।

लुप्त हुई मुस्कान अधरों की , खुशियाँ ये सारी सुप्त हुई
लथपथ तिरंगा खून से रंगकर, ना जाने क्यों सुषुप्त हुई।

गद्दार हमारे बीच खड़ा है, आतंकवाद आकाओं के
राजनीति की गोली मारो , ऐसे राज नेताओं के।

बलिदानों की है बलिहारी, वतन के लिए जो मर जाते हैं
ऐसे वीर सिपाही शान पर, हम अपना शीश झुकाते हैं।

9

सत्यलोक निवासिनी
शतरूपा विणावादिनी
वाग्देवी तूं भारती माँ शारदा।

शुक्लवर्ण श्वेत वस्त्रधारिणी
श्वेत पद्मआसना तूं उपासना
परमेश्वरी भगवती माँ शारदा।

चराचर जगत तूं विराजती
वेद विभूति मंत्र उचारती
हर स्वर तेरा संगीत माँ शारदा।

मोहक मयूर – हंस वाहिनी
बुद्धि – ज्ञान की तूं दायिनी
श्रृंगार तूं वसंत की माँ शारदा।

ज्ञान तुम विज्ञान तुम
संसार के भी सार तुम
उर मेरे प्रकाश दो माँ शारदा।

अंधकार ये अज्ञानता
बालक अबोध है पुकारता
ज्योति एक जला माँ शारदा।

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 06/03/2019

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