कविते!

माना कि जोर बहुत है तुझमें
पर आज मुझे झोंकनी है ताकत
देखता हूँ कैसे रचवाती हो खुद को!

मृत घोषित होकर भी हो जीवित
पढ़ता ही कौन है तुम्हें
फँस चुकी हो पुरस्कार-फुरस्कार की दलदल में
पाठ्यक्रमों तक में सरेआम भोग लेती हो बलात्कार

कैसे रह लेती हो शान्त तब भी!

जानता हूँ बहुत जोर है तुझमें
और जिद्दी भी कम नहीं
और मूर्ख इतनी कि अकेला भी चलने को तैयार
फूँक फाँक, छोड़-छाड़ घर द्वार।

अशोक हो
हो पीपल सी
अध्यात्म भी, विज्ञान भी
कैसी हो तुम, पृथ्वी सी
रहस्य भी, अनिवार्य भी।

कितनी सहज हो तुम
दिखती न दिखती लहर सी।

पर बदमाश भी, थोड़ी चुलबुली
रचवा ही लिया न खुद को।

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