न जाने क्यों

न जाने रोज कितने सपनें
मेरे तकिये से लिपटे रह जाते है
न जाने रोज कितने ही मौके
मेरे हाथ से निकल जाते है

न जाने रोज कितनी ही ठोकरे
मुझे नया सबक देना चाहती है
न जाने उगता सूरज शाम को डूबकर
मानो मुझसे कुछ कहना चाहता है

न जाने क्यों रोज रात को ये तारे
मेरे उदास चेहरे को देखकर
और जोर से टिमटिमाने लगते है

कहने को तो चाँद मैं भी धब्बे है
लेकिन मुझे देखकर के
वो भी खुद पर इतराने लगता है

न जाने क्यों इतनी जल्दी मैं
बच्चे से बड़ा हो गया
न जाने क्यों बाकी सब की तरह
उसी लाइन में जाकर खड़ा हो गया

न जाने क्यों मेरा दिल कहता है
कि मैं दुनिया में अकेला हूँ
मैं अंदर से इक मेला हूँ
लेकिन बाहर झमेला हूँ

न जाने क्यों हर भीड़ में
मैं खुद को अकेला कर लेता हूँ
न जाने क्यों इक बन्द कमरें में बैठकर
मैं ये सब बातें सोचा करता हूँ

न जाने क्यों
न जाने क्यों …..।।

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

One Response

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 06/03/2019

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