देखूँ जिस ओर   … भूपेन्द्र कुमार दवे

देखूँ जिस ओर   

 

 देखूँ जिस ओर तो मुझको श्रंगार अनूठा दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

 

वह मँड़राते फिरते भ्रमरों का

फिर कुछ इतराना कलियों का

डाल डाल पर खिलते सुमनों का

सजना और रिझाना गंधों का

खुली पंखुरी पर शबनम कण भी मोती जैसा दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

 

चूम चूमकर लाली पूरब की

वह प्यार जताना नव किरणों का

फिर संध्या की गोदी में छिपकर

और नशीला बनना रातों का

तारों की झुरमुट में छिपता चाँद सलोना दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

 

श्रंगार कर्म है सब धर्मों का

विविध अर्थ है सारे शब्दों का

पर शब्द शब्द मिल वाणी बनते

कर जाते हैं मंथन ग्रंथों का

खाली हो मन मंदिर तो भी वह दमकता दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

 

सत्संग भी है जमघट भक्तों का

हिन्दु, ईसाई, मुस्लिम, सिख्खों का

मिटती जाती है प्यास सभी की

जो पीता है अमृत कण धर्मों का

मंदिर की मूरत में भी ब्रह्यांड़ अजूबा दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

 

जर जर आँचल में छिपकर सोते

मुस्काना उन भूखे बच्चों का

माँ की ममता का आँसू पाकर

नई मिसाल बन जाना दीपों का

भारत माँ के हर बच्चे में देश दमकता दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

 

हर गरीब की कुटिया के अंदर

सब दुख सहते जीना वृद्धों का

हाल हमारे सूखे खेतों का

बतलाना उन गीली आँखों का

बारिश में भी बाढ़ का आना गजब खौफ-सा दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

 

कभी धड़कना अंतिम सासों का

नयी आस ले तकना नयनों का

वो आना मुस्काती यादों का

फिर कुछ दुबकी दुखती नब्जों का

यह जीवन का दर्शन भी कुछ चौंकाता-सा दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

 

खुद बैसाखी बनना पैरों का

गिरकर और तड़पना प्राणों का

औ कराहते बस बाट जोहना

पाने दर्शन निज नम पलकों का

यह जीवन बचपन-सा मुझको खेल-खिलौना दिखता है।

टूटी फूटी गुड़िया से भी जो नहीं ऊबता दिखता है।

 

देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है।

देखूँ जिस ओर तो मुझको श्रंगार अनूठा दिखता है।

            … भूपेन्द्र कुमार दवे

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One Response

  1. deveshdixit Devesh Dixit 23/02/2019

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