जा रहा हूँ

बंजर हो गया हूँ
अब और कुछ किया नही जाता
रेत की मानिंद फिसल रही ज़िन्दगी
रेत में मिला जा रहा हूँ
उम्मीद की कोई किरण
दिखती नहीं अब
अपने सपने को
आँखों से बहाता जा रहा हूँ
बुझ रही है दीये की लौ
रौशनी मुक्कदर नहीं मुझे
काली स्याह रात ही अच्छी है
अपनी नाक़ामियाँ छिपाने के लिए
दिन का उजाला बेनकाब कर दे ना मुझे
इसलिए अपने चेहरे को नक़ाब के पीछे
छिपाता जा रहा हूँ
शीशे तोड़ दिए है घर के
कुछ और देखने को बचा नहीं
अब रुकसत होने का वक़्त है शायद
ज़िन्दगी का हिसाब पूरा हुआ
अपनी कोशिशों को
दीवारों में दफन कर रहा हूँ
बहुत वफाई निभा चुका
अब ज़िन्दगी से बेवफाई कर रहा हूँ–अभिषेक राजहंस

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