बलिदान – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

चूड़ी रोयी – रोया कंगना, बिंदी माथ की गिर गयी अंगना
सुहागन की सिंदूर लुटा है, चित विह्वल से करती क्रंदना।

सूनी हाथों की मेहदी है , बिखर गये चूड़े की गज़रा
अस्त – व्यस्त ये तन के कपड़े, बह रही आँखों की कज़रा।

माँ की देखो गोद लुट गयी , बाप. का भी छिन गया सहारा
बहन अब मजबूर हो गयी , बह रहा अब आँसुओं की घारा।

बच्चे उनके बिलख रहे हैं, घर आंगन सब सिसक रहे हैं
हालत हुए खराब सभी के, अपने आप में सिमट रहे हैं।

तिरंगे में आया जब अर्थी , ऐसा लगा पहाड़ टूट गया
मच गयी हाहाकार सी ,अपने खून का साथ छूट गया।

यह कैसा बलिदान है भाई ? जो हर बार मुसीबत लाता है
कर नहीं कुछ हम सब पाते , वो तब इतना इतराता है।

लुप्त हुई मुस्कान अधरों की , खुशियाँ ये सारी सुप्त हुई
लथपथ तिरंगा खून से रंगकर, ना जाने क्यों सुषुप्त हुई।

गद्दार हमारे बीच खड़ा है, आतंकवाद आकाओं के
राजनीति की गोली मारो , ऐसे राज नेताओं के।

बलिदानों की है बलिहारी, वतन के लिए जो मर जाते हैं
ऐसे वीर सिपाही शान पर, हम अपना शीश झुकाते हैं।

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