पीड़ा की लहरें – शिशिर मधुकर

शहीदों की चिताओं पर उठी पीड़ा के लहरें हैं
मगर सोचो ज़रा हम ही तो असली अंधे बहरे है
सोचते रहते हैं एक दिन शेर भी घास खाएगा
जेहादी बुद्ध बन सबके दिलों के पास आएगा
अरे कश्मीर में गर तुमने बाकी देश ना भेजा
कभी भूभाग तुमसे जाएगा न ये फिर तो सहेजा
कत्ल तुम लाखों द्रोहियों का यूँ ही कर नहीं सकते
ये अलगाव के नारे फूलों से मर नहीं सकते
भेजो भारत की जनता को देश के हर इक कोने में
विफल तब होते जाएंगे द्रोही सब एक होने में
समाजों को समाजों की दवा ही रास आएगी
कोई अलगाव की फिर ना फिजा में बास आएगी

शिशिर मधुकर

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