“जागो भाग्य विधाताओं”

“जागो भाग्य विधाताओं”

देखा अजब तमाशा, छायी दिल में निराशा,
चार गीदड़ ले गये, मूँछ तेरी नोच के।
सोये हुए शेर तुम, भूतकाल में हो गुम,
पुरखों पे नाचते हो, नाक नीची सोच के।।

पूर्वजों ने घी था खाया, नाम तूने वो गमाया,
सूंघाने से हाथ अब, कोई नहीं फायदा।
ताव झूठे दिखलाते, गाल खूब हो बजाते,
मुँह से काम हाथ का, होने का ना कायदा।।

हाथ धरे बैठे रहो, आँख मीच सब सहो,
पानी पार सर से हो, मुँह तब फाड़ते।
देश में है लोकतन्त्र, फैला पर भ्रष्टतन्त्र,
दोष एक दूसरे को, दे के हाथ झाड़ते।।

ग़ुलामी की ठण्ड शख्त, जमा गयी तेरा रक्त,
आज़ादी की कड़ी धूप, पिघला न पायी है।
चाहे देश प्रतिशोध, कोई न बर्दाश्त रोध,
जागो भाग्य विधाताओं, मर्यादा लजायी है।।

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन,
तिनसुकिया

(पुलवामा में मृत जवानों को श्रद्धांजलि)

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