रुक रुक कर जीता चल…..

कलियां चुन बंजारे, और जमुना के तीरे चल,
दौड़ नहीं है जीवन, रुक रुक कर जीता चल।

हर पल की अलग व्यथा है, कहता है लिखने वाला,
सबकी सुन हँस ले रो ले, पर अपनी मस्ती में चल,
अब खोल उनींदी आंखें, सांसों को गिनता चल।

माटी की कीमत होगी, जो हाथ कुम्हार के आये,
सुन सावन के अनुरागी, ये साल भी बीता जाये,
जो हाथ लगा है लेकर, सुर ताल मिलाता चल।

हर बार ये संगम होगा, हर रोज़ समागम होगा,
मिल कर ही न रह जाना, कुछ दूर भी जाना होगा,
नज़रों से नज़र मिलाकर हाथ मिलाता चल।

—भारत (ভারত জৈন)

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