जुआरी दांव पर खुद को लगाने आज बैठा है…

हार कर घर बार सारा सुख, पाने आज बैठा है,
जुआरी दांव पर खुद को लगाने आज बैठा है।

नहीं बाकी रही कीमत तेरी, तेरी ही नज़रों में,
जो रख कर हासिये पर सिर कटाने आज बैठा है।

चिताओं से उड़ कर बू चली आई महक बनकर,
कि सुरीली याद के मोती उठाने आज बैठा है।

वहां से डोलियां उठ कर चली शहरों में जाती हैं,
पर तू क्यूँ गाँव में ही दिल लगाने आज बैठा है।

ये उसके माथे का बेंदा ही लाखों में आता है,
तू खाली जेब टूटे दिल से मनाने आज बैठा है।

—भारत(ভারত জৈন)

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