जिन्दगी और मौत

जिन्दगी और मौत

मौत से पूछ तो लो कि कब कहाँ ले जावेगी
इस अपाहिज जिन्दगी को कैसे ले जायेगी।

एक बार तो वाह जरूर इस तरफ आवेगी
बटोरकर पुरानी यादें नई दे जावेगी।

इन पलकों ने लरजते अश्क रखें है जनम से
नमालूम कब तक ये इन्हें यूँ सहलायेगी।

न जाने कहाँ ये तूफॉन उड़ा ले जावेगा
और कौन सी लहर उस किनारे ले जायेगी।

जीवन कब बिगड़ जावेगा, कब सँवर जावेगा
नमालूम ये मौत यहाँ कब क्या कर जायेगी।

जिन्दगी! अब तू इस मौत के खौफ की ना सोच
सहेली है यह तेरी प्यार से ले जायेगी।
…. भूपेन्द्र कुमार दवे
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