गीत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

चंदन वन के जैसे महके
चिड़ियों सा हम चह – चह चहके।
वन ये उपवन चमन वतन में
हम सोने के जैसे दहके।।

ढ़ूढ रहे सूरज की लाली
कहाँ गये देखो फुलवारी।
तन मन था जो कितना निश्छल
क्यों बन रहे मनुज अब जाली।
औरो के जैसे ना बहके
चिड़ियों सा हम चह – चह चहके।।

छल – कपट सब दूर थे कितने
सभ्यता मशहूर थे कितने।
संस्कृति और धर्म सनातन
थे गुरूर, संस्कार अपने।
घर – घर जायें ऐसे चलके
चिड़ियों सा हम चह – चह चहके।।

रिश्तों को अब भूल रहे सब
धन – दौलत में झूल रहे सब।
लाज – लेहाज मार दिये अब
जाँ लेने को तूल रहे सब।
थक चुके आप सबसे कहके
चिड़ियों सा हम चह – चह चहके।।

लूट पाट सब बढ़े अपहरण
बलात्कार , नैतिक की क्षरण।
मानवता को रखे ताक पर
जिधर जाइये उधर है मरण।
मत लेना इसको तुम हल्के
चिड़ियों सा हम चह – चह चहके।।

धर्म – मर्म – सत्य – कर्म छोड़ें
बुरे लत सब साथ क्यों जोड़े।
देख – देख में बढ़ता फ़ैशन
हर नियम कानून ये तोड़े।
समझे औ समझाये चलके
चिड़ियों सा हम चह – चह चहके।।

जागो काहे पाप कर रहे
नजरों में क्यों श्राप बन रहे।
बहके हो तुम क्यों ऐ मानव
संस्कृति काहे साफ कर रहे।
सपने देखें अब हम कल के
चिड़ियों सा हम चह – चह चहके।।

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/02/2019

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