सलीम रज़ा रीवा की 20 ग़ज़लें – salimraza rewa

ज़िंदगी का सहारा मिले ना मिले
साथ मुझको तुम्हारा मिले ना मिले
oo
आजा तुझको गले से लगा लू सनम
इतनी फ़ुरसत दुबारा मिले ना मिले
oo
नीद में ख़्वाब में दिन में औ रात में
तू मिले कुछ भी यारा मिले ना मिले
oo
माँ की शफ़क़त जहाँ में बड़ी चीज़ है
ये मोहब्बत की धारा मिले न मिले

जी ले खुशिओं की पतवार है हाँथ में
बहरे ग़म में किनारा मिले न मिले
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हमसफ़र तुम सा प्यारा मिले न मिले
साथ मुझको तुम्हारा मिले न मिले
oo
इश्क़ का कर दे इज़हार तन्हा है वो
ऐसा मौक़ा दुबारा मिले न मिले
oo
साँस बनकर रहो धड़कनों में मेरी
मुझको जन्नत ख़ुदारा मिले न मिले
oo
वो भी होते तो आता मज़ा और भी
फिर सुहाना नज़ारा मिले न मिले
oo
क्या बताये हुई क्या है मुझसे ख़ता
सुनके नज़रे दुबारा मिले ना मिले
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चाँद जैसे मुखड़े पे तिल जो काला काला है
मेरे घर के आँगन में सुरमई उजाला है
oo
वज़्म ये सजी कैसी कैसा ये उजाला है
महकी सी फ़ज़ाएँ हैँ कौन आने वाला है
oo
मुफ़लिसी से रिश्ता है ग़म से दोस्ती अपनी
मुश्किलों को भी हमने दिल में अपने पाला है
oo
उसकी शोख़ नज़रों का ये कमाल है देखो
ज़िंदगी में अब मेरी हर तरफ उजाला है
oo
इतनी सी गुज़ारिश है नींद अब तो जल्दी आ
आज ख़ाब में मेरा यार आने वाला है
oo
भूल वो गया मुझको ग़म नहीं रज़ा लेकिन
हमने उसकी यादों को अब तलक सँभाला है
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हम दर-बदर की ठोकरे खाते चले गए
फिर भी तराने प्यार के गाते चले गए
oo
कोशिश तो की भंवर ने डुबोने की बारहा
हम कश्ती-ए-हयात बचाते चले गए
oo
रुसवाईयों के डर से कभी बज़्में नाज़ में
हंस-हंस के दर्द-ए-दिल को छुपाते चले गए
oo
अपना रहा ख़्याल न कुछ होश ही रहा
आँखों में उनकी हम तो समाते चले गए
oo
करता है जो सभी के मुक़द्दर का फ़ैसला
उसकी रज़ा की शम्अ जलाते चले गए
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तुमको प्यार करते थे तुमको प्यार करते हैं
जाँ निसार करते थे जाँ निसार करते हैं
oo
ख़ुश रहे हमेशा तू हर ख़ुशी मुबारक हो
ये दुआ खुदा से हम बार – बार करते हैं
oo
उँगलियाँ उठाते हैं लोग दोस्तों पर भी
हम तो दुश्मनों पर भी ऐतबार करते हैं
oo
हम तो जान दे देते उनके इक इशारे पर
दोस्तों में वो हमको कब शुमार करते हैं
oo
फूल सा खिला चेहरा आँख वो ग़ज़ालों सी
आके ख़्वाब में अक्सर बेक़रार करते हैं
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इश्क़ तुमसे किया नहीं होता
ज़िन्दगी में मज़ा नहीं होता
oo
ज़िन्दगी खुद संवर गयी होती
तू जो मुझसे जुदा नहीं होता
oo
तेरी चाहत ने कर दिया पागल
प्यार इतना किया नहीं होता
oo
चोट खाएँ भी मुस्कुराएँ भी
अब तो ये हौसला नहीं होता
oo
सबको दुनिया बुरा बनाती है
कोई इंसाँ बुरा नही होता
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दूर जितना ही मुझसे जाएंगे
मुझको उतना क़रीब पाएँगे
oo
फिर से खुशिओं के अब्र छाएंगे
डूबते तारे झिल मिलाएंगे
oo
कुछ न होगा तो आंख नम होगीं
दोस्त बिछड़े जो याद आएंगे
oo
माना पतझड में हम हुए वीरां
अब के सावन में लहलहाएँगे
oo
इक ग़ज़ल तेरे नाम की लिखकर
सुबह ता शाम गुनगुनाएँगे
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छोड़कर दर तेरा हम किधर जाएँगे
बिन तेरे आह भर-भर के मर जाएँगे
oo
तूने छोड़ा अगर साथ मेरा कभी
हिज्र मे तेरे घुट-घुट के मर जाएँगे
oo
तेरी आमद की जिस दम सुनेगें ख़बर
राह में फूल बन कर बिखर जाएँगे
oo
आपको देखकर चाँद शरमाएगा
मेरी जां आप जिस दम संवर जाएँगे
oo
बन संवर के अगर आप आ जाएं तो
बज़्मव में सब के चेहरे उतर जाएँगे
oo
इश्क़ मुश्किल बहुत है मगर ऐ ‘ रज़ा ‘
इश्क़ में फिर भी हद से गुज़र जाएँगे
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मेरा हमदम है तो हर ग़म से बचाने आए
मुश्किलों में भी मेरा साथ निभाने आए
oo
जिनको जीने की दुआ दी है हमेशा मैंने
आज महफ़िल में वही ऊँगली उठाने आए
oo
जुर्म करने से कभी बाज नहीं आते जो
अम्न की बात वही मुझको सिखाने आए
oo
पाप धुल जाते हैं सुनते हैं यहां पर आ कर
बस यही सोच के गंगा में नहाने आए
oo
दिल न तोड़ेंगे ‘रज़ा’ इतना यक़ीं था जिनपर
बे वफ़ाई का वो इल्ज़ाम लगाने आए
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मुझसे ऐ जान-ए-जानाँ क्या हो गई ख़ता है
जो यक ब यक ही मुझसे तू हो गया ख़फ़ा है
oo
टूटी हुई हैं शाख़ें मुरझा गई हैं कलियाँ
तेरे बग़ैर दिल का गुलशन उजड़ गया है
oo
आंखें हैं सुर्ख़ रुख़ पर ज़ुल्फें बिखर रही हैं
हिज्रे सनम में शब भर क्या जागता रहा है
oo
तुमने तमाम खुशियाँ औरों के नाम कर दीं
तेरी इसी अदा ने दीवाना कर दिया है
oo
फाँसी की सज़ा देकर ख़्वाहिश वो पूछते हैं
अब क्या उन्हें बताएं क्या आख़िरी ‘रज़ा’ है
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मेरे हाथो में ख़ुशी का जाम है
ये मेरे सब दोस्तों के नाम है
oo
मेरा घर खुशिओं से है फूला-फला
मेरे रब का ये बड़ा इनआम है
oo
दोस्ती उससे मुनासिब ही नहीं
शहर की गलिओं में जो बदनाम है
oo
यार की क़ुर्बत मुझे हासिल हुई
ये मोहब्बत का मेरे इकराम है
oo
दुश्मनी हम तो ‘रज़ा’ करते नहीं
दोस्ती तो प्यार का पैग़ाम है
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पहले ग़लती तो बता दे मुझको
फिर जो चाहे वो सज़ा दे मुझको
oo
सारी दुनिया से अलग हो जाऊँ
ख़ाब इतने न दिखा दे मुझको
oo
हो के मजबूर ग़म-ए-दौरां से
ये भी मुमकिन है भुला दे मुझको
oo
या खुदा वक़्त-ए-नज़ा से पहले
उसका दीदार करा दे मुझको
oo
साथ चलना हो ‘रज़ा’ नामुमकिन
ऐसी शर्तें न सुना दे मुझको
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जब से तुमको बसा लिया है आँखों में
नीद नहीं आती है तब से तो रातों में
oo
दिल के हाथों था मजबूर बहुत वरना
मैं कब आता उनके मीठी बातों में
oo
उनको पाकर मैंने सब कुछ पाया है
खुशियों की सौग़ात है मेरे हाथों में
oo
हर शय में तेरा ही चेहरा दिखता है
तेरी ही खुशबू है मेरी साँसों
oo
उनको खो देने का ‘रज़ा’ अहसास हुआ
रंग-ए-हिना जब देखा उनके हाथों में
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कौन कहता है की नज़र तक है
वार उनका मेरे जिगर तक है
oo
मस्त नज़रों का मय जिधर तक है
खूबसूरत फ़िज़ा उधर तक है
oo
चाँद निकला है मेरे आँगन में
रोशनी मेरे बामो दर तक है
oo
चाँद सूरज चले इशारों से
उनके क़ब्ज़े में तो सजर तक है
oo
ग़म ख़ुशी ज़िंदगी में हैं शामिल
अब निभाना तो उम्र भर तक है
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रात का जादू चल जाएगा
जिस दम सूरज ढल जाएगा
oo
सँभल के चलना सीख लें वर्ना
कोई तुझको छल जाएगा
oo
बचपन के दिन याद आएँगे
जिस्म जवां जब ढल जाएगा
oo
ग़म से हमने यारी करली
वक़्त बुरा अब टल जाएगा
oo
अँगारे मत बोना घर में
घर आँगन सब जल जाएगा
oo
दुनिया का दस्तूर “रज़ा” है
आज जो है वो कल जाएगा
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शाम आना है सुब्ह जाना है
दिल सितारों से क्या लगाना है
oo
दिल ये कहता है तुम चले आओ
आज मौसम बड़ा सुहाना है
oo
प्यार उल्फत वफ़ा मुहब्बत सब
ये तो जीने का इक बहाना है
oo
सच कहाँ होती ख़्वाब की बातें
ख़्वाब होता मगर सुहाना है
oo
ग़म फ़क़त है नहीं मेरे संग में
चंद खुशिओं का भी खज़ाना है
oo
ऐ रज़ा हौसला रहे कायम
चोट खाकर भी मुस्कुराना है
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.Nov18
ग़मों की लज़्ज़त चुराके लेजा मेरी मसर्रत चुराके लेजा
या ज़ौक़-ए-उल्फ़त चुराके लेजा या दिल की हसरत चुराके लेजा
oo
क़दम क़दम पर उजाला बन कर ये साथ देंगी तेरा हमेशा
मेरी सख़ावत चुरा के लेजा मेरी शराफ़त चुरा के लेजा
oo
बना सके तो बना ले कोई हमारे जैसा तू एक चेहरा
ये मेरी सूरत चुराके लेजा ये मेरी रंगत चुराके लेजा
oo
करम का गुलशन खिलेंगा इकदिन मुझे भरोसा है मेरे रब पर
भले ये हिम्मत चुराके लेजा भले ये ताक़त चुराके लेजा
oo
ये मेरी धड़कन ये मेरी साँसें ये जिस्म मेरा है इक अमानत
तू मेरी दौलत चुराके लेजा तू मेरी शोहरत चुराके लेजा
oo
मेरा हुनर तो अता-ए-रब है इसे चुराना बहोत है मुश्किल
‘रज़ा’की आदत चुराके लेजा ‘रज़ा’ की फ़ितरत चुराके लेजा
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Nov17
जब, तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी
लब, तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी
oo
तुम मेरे साथ हो, चांदनी रात हो, होंट की बात हो, ज़ुल्फ़ की बात हो
तब, तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी
oo
हम नहीं चाँद तारे ये काली घटा गूंचा ओ गुल ये बुलबुल ये महकी फिज़ा
सब, तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी
oo
हम गुनहगार है, हम सियह कार हैं, फिर भी रहमो करम पे यकी है हमें
जब, तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी
oo
ऐ रज़ा दर – बदर हम भटकते रहे प्यार क्या, प्यार का इक निशाँ ना मिला
अब, तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी
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Oct17
वतन की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ
अमन की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ
oo
बहारों से नज़ारों से सितारों से नहीं मतलब
नयन की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ
oo
गुलो गुलशन कली औ फूल शबनम मन को भाते है
चमन की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ
oo
न तो शिकवा शिकायत रूठने की बात मत करना
मिलन की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ
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बिना समझे न ढूंढो ऐब मेरी शायरी में तुम
सुख़न की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ
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सलीम रज़ा रीवा
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4 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 05/02/2019
    • SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 10/02/2019
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 05/02/2019
  3. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 10/02/2019

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