एक दफा और

शीर्षक – एक दफा और
हाँ ,डर है मुझे
मैं खुद को कैसे खड़ा कर पाऊँगा
गिरता रहा हूँ रोज ही नजरो से
क्या मैं उठ पाऊँगा
कोशिश जरूर कर रहा हूँ
गिर कर उठने की
कभी तो कभी जरूर सफल हो जाऊँगा
एक दफा और सही
रास्ता भूल जाऊँ अपना
पर मंजिल की तरफ क़दम अपना
रोज बढ़ाता रहूँगा
जो शब्द मुझे छलनी करने की
कोशिश करेंगे
उनसे ही मैं शब्दबेधी बाण
चलाना सीख लूँगा
जो अर्जुन ना बन पाया तो
एकलव्य बन कर ही जी लूँगा
मैं मुहम्मद गोरी से कुछ तो सीख लूँगा
जो पत्थर मुझे चोट पहुंचाने की
कोशिश करेंगे
उन्हें ही अपना मील का पत्थर बना लूँगा
एक दफा और
मैं कोशिश करूंगा—अभिषेक राजहंस

One Response

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 02/02/2019

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