श्रृंगार – छंद – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

श्रृंगार छंद

रात में हम अब होते नहीं
काम में बाहर रहते कहीं।
तो बता बालक ये कौन है
तू गयी जहाँ रह गयी वहीं।।

नाक की ये नथिया गिर गयी
माथ की ये गजरा तिर गयी।
होश अब नहीं रहा, क्या कहें
मैं उधर ही जाकर घिर गयी।।

नाम अब जुबान पे आ गयी
बात अब जादू सा छा गयी।
हो गयी मुलाकात इस कदर
जान मेरे मन को भा गयी।।

मैं नहीं कहा कौन है सही
आप बोलो मैंनें क्या कही।
ना सकोगे तो तुम देखना
ये नहीं कहो दूध है दही।।

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