दोहे – (प्रयाग राज) – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

नागा साधू मस्त हैं, अपने – अपने ढंग।
ऐसे बिगुल बजा रहे, सब हो जाते दंग।।

मेला कुंभ प्रयाग में, लगी गंग के तीर।
गंगा यमुना शारदा, संगम बहे समीर।।

ज्ञानी – ध्यानी संत हैं, इस नगरी के लोग।
थाती उनकी बोलती, ये सब है संयोग।।

ध्यान योग स्नान का, पावन तीर महान।
वैतरणी ही नाम है, दया – धर्म औ ज्ञान।।

युग युगों की परंपरा, में है अब विश्वास ।
धरा इसी का नाम है,टिकी इसी पर आस।।

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