प्रेम के मनके – शिशिर मधुकर

ढूँढता हूँ निशां तेरे जब भी तन्हा मैं होता हूँ
आज भी यादों में तेरी मन ही मन मैं रोता हूँ

यूँ तो शैय्या सजाई है ओर आँखों को मूंदा है
मगर बेचैनियों की मार से मैं तो ना सोता हूँ

मुहब्बत को भुला पाना कभी आसां न होता है
सतह कुछ लम्हें आते है उसे जब ही डुबोता हूँ

दर्द तेरी जुदाई का कुछ ऐसा बस गया मुझमें
मुझे ना पीर उठती है अगर नश्तर चुभोता हूँ

ये माला ज़िन्दगी की जाने कैसे टूट जाती है
तुम्हारे प्रेम के मनके जब भी मधुकर पिरोता हूँ

शिशिर मधुकर

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 23/01/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/01/2019

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