मुझे अब फ़र्क नहीं पड़ता

तेरे होने या ना होने से
मुझे अब फर्क नहीं पड़ता
तुम्हे ऑनलाइन देखने के लिये
अब रात- रात भर नहीं जगता
जज्बात मेरे भीतर का जो था तुम्हे लेकर
अब वो उफान नहीं भरता
अब तुम किसी के साथ सेल्फी खींचो
मुस्कुराओ या फिर किसी के गले ही लग जाओ
मेरे दिल के भीतर अब कुछ नहीं जलता
आखिर कहूँ तो क्या कहूँ तुम्हे
तुम् मेरी मोहब्बत को समझ पाती
ऐसी तुम्हारी औकात नहीं
तुमसे दूर जा कर ही जान पाया मैं
तुम में कोई बात नहीं
ना तुम हीर हो सकती थी
और ना तुम बन सकी थी लैला
जाओ,तुम चली जाओ
शीशे में देख लो खुद को
शायद तुम्हे दिख ही जाए
तुम्हारे भीतर का कालापन
मैं तो काजल की कोठरी से भी
बेदाग निकल आया
तुम चांद बन कर भी
दागदार हो गयी
जाओ,तुम चली जाओ
तेरे होने या ना होने से
मुझे अब फर्क नहीं पड़ता–अभिषेक राजहंस

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