दोहावली – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

दोहावली

इतना तो करना भला , जो तुम से हो जाय।
ऐसी गलती मत करो, लोग सभी घबराय।।

संगी साथी जो मिले, करना मन की बात।
नाता रिश्ता प्रेम का, सब खा जाये मात।।

छलिया मन से ना बनो, ये तो है अपराध।
कर्म करो अच्छा भला, मन में लो ये साध।।

धन- दौलत के सामने, बेबस क्यों हैं लोग।
लालच मन घर कर गया , है कैसा ये रोग।।

सुखमय जीवन है वही, जो रखता संतोष।
जो जन हैं भटके यहाँ उनके मन में दोष।

माया का संसार है, ममता का है जाल।
मानव यहीं उलझ गया, रहता है बेहाल।।

मन भाया मनमोहिनी, दिल में नाचा मोर।
प्रेम में हम डूब गये, जैसे चाँद – चकोर।।

मृग नयनी चंचल बदन , नागन अस है चाल।
गाल गुलाबी मस्त है, रेशम जैसी बाल।।

जब मुस्काती हो कभी, तब- तब छलके जाम।
जो मिल जाओ तुम अगर, पूरी चारो धाम।।

अब ऐसा होता नहीं, जो हो जाये काम।
जो है डूबा आजतक, उसका काम तमाम।।

प्रीत यहाँ दिल जोड़ता, है रिश्तों का मेल।
मात – पिता, भाई – बहन, सब है प्रभु का खेल ।।

अर्धांगिनी होती वही, जो रखती है मान।
दो घर वो संभालती, तो मिलता सम्मान।।

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 17/01/2019

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