अब मैंने भी

तुम्हारे बिना
मैंने जीना सीख लिया है
थोड़ा सा नीचे गिर कर उठना सीख लिया है
तुम जा रहे हो तो जाओ ना
अब मेरी आँखों ने
तुम्हारे लिए आँसू बहाना छोड़ दिया है
तुम भूले हो ना अपना वादा
अब मैंने भी
तुम्हारे लिए मरने का इरादा छोड़ दिया है

जो भी हुआ,जैसे भी हुआ
वो एकतरफ़ा नहीं था
तुम ही तो थे
जो मुझसे मेरी साँसे मांगने चले थे
मुझे अपनी ज़िन्दगी बनाने लगे थे
रोज-रोज सपने दिखाने लगे थे
अपनी मासुमियत से मुझे रिझाने लगे थे
तुम अपनी लत मुझे लगाने लगे थे
तुमने ही तो पहले इजहार किया था
मैंने भी तुम्हे कभी इनकार नही किया था

फिर आज तुम्हे क्या हो रहा है
किस बात की नाराजगी है तुम्हारी
कुछ तो बोलो ना
क्या तुम शातिर इंसान थे
जो अपनी मासुमियत से मुझे जीतने चले थे
मेरी रूह को कैद करने चले थे
अगर ऐसा है तो जाओ
आज से आजाद हो तुम और मैं भी
ये फासले अब रहने ही दो
तुमने जो जख्म दिए
वक़्त सब भर देगा धीरे-धीरे
अब मैंने भी
पीछे मुड़ना छोड़ दिया है
जाओ,जी लो अपनी ज़िंदगी
अब मैंने भी
अपने तरीके से जीना सीख लिया है–अभिषेक राजहंस

One Response

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 17/01/2019

Leave a Reply