अरूण कुमार बिट्टू – शायरी


मै निकला तेरी गली से , एक झलक पाने के लिए
जो जुड़ा था रिस्ता उसे निभाने के लिए
पर तू निकली बेरहम ,टूटी मेरी वहम
तूने लगा दी सौ नम्बर पुलिस बुलाने के लिए


कैसी भी हो घरवाली बेकार लगती हैं
दूसरे की घरवाली बड़ी खास लगती हैं
गोरी हो फिर तो केहना ही क्या है यारो
सावली हो वो फिर भी कोइ मुमताज लगती हैं


एक बारात निकल कर आई हैं
नेता जी की अगुवाई हैं
जनता को बनाया हैं आज हजूर
क्योकी पाच साल जनता की ही तो खाई हैं


अच्छे दिन आ गए मोदी जी सबपे छा गए
उछलने लगे सवाल फिर रौबर्ट वाड्रा के खिलाफ
लगता है भईया जी फिर चुनाव आ गए


निती भी अच्छी थी
नीयत भी सच्ची थी
फिर भी कुछ स्टेट खिसक गए
लगता है राम मंदिर इनको गटक गए


ये कलम बड़ा स्वाभिमानी हैं
किसी सत्ता का गुलाम नही
जब लिखता हू सच लिखता हू
फिर परिणाम की परवाह नहीं

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