जिद छोड़ो – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

ऐसे में कब – तक, सिसकते रहोगे
जिद छोड़ो वरना, फिसलते रहोगे।

क़वायद में तेरा, कमी आ गया है
आवेग में अब वो, नमी आ गया है
गुफ्तगूँ में क्या तुम, मचलते रहोगे
जिद छोड़ो वरना, फिसलते रहोगे।

कर जुस्तजू, हौसला फिर से लाओ
बढ़ते रहो, वो कला फिर से लाओ
बदल जा वरना, हाथ मलते रहोगे
जिद छोड़ो वरना, फिसलते रहोगे।

बीता जो अबतक, नहीं याद करना
विधाता से अब तो, फरियाद करना
ऐसा तुम किये तो, निकलते रहोगे
जिद छोड़ो वरना, फिसलते रहोगे।

बन जायेगी फिर, किस्मत ये तेरी
निखर जायेगी, नसीहत अब तेरी
खड़ा तो अब हो, संभलते रहोगे
जिद छोड़ो वरना, फिसलते रहोगेे

तुझे आवाज़, ये मंजिल दे रही है

मौका तुझको, हर  दिल दे रही है

कब तक तुम ऐसे, बहकते रहोगे

जिद छोड़ो वरना, फिसलते रहोगे।

 

कवायद – कार्यविधि, नियमावली

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 14/01/2019

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