हाँ, मरीज हूँ मैं

हाँ, मरीज हूँ मैं
दवा ढूंढ़ने निकला हूँ
अजीब ही बीमारी लगी है
ना नब्जों से पकड़ आती है
ना धड़कने कुछ बतला पाती है
सुकून तो अब नसीब ही नहीं होती
पता नहीं कैसी लाइलाज बीमारी है
दवाखाने में रोज भटकता हूँ
की कहीं कोई दवा मिल जाये
नींद बस जाए आँखों मे
ख़्वाब दिखने बंद हो जाये
पर कमबख्त दिल है ना
ये तो बस मयखाने में ही सुकून पाता है
लडख़ड़ाते कदमों को देखकर
जमाना पागल कहने लगा है
उन्हें कैसे बताऊँ
जिंदा हूँ मैं
पर ज़िन्दगी पास नहीं हैं
हाँ ,मैं मरीजे-इश्क़ हूँ
जिसकी कोई दवा नहीं —अभिषेक राजहंस

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 08/01/2019

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