संतोष – शिशिर मधुकर

भले तू दूर है मुझसे मगर दिल में तो बसता है
मुझे संतोष है इसमें तू मिलने को तरसता है

समेटे दिल में तूफां को घुमड़ आते हैं बादल भी
मगर कुछ तो वजह होगी मेघ हर ना बरसता है

जो जैसा है उसे वैसा ही अब तो मान लो तुम भी
दुखी रहता है वो इंसा जो सबको सांचे में कसता है

जुदा होता है वो इंसा जिसे गैरों की परवाह हो
ज़माना आज ऐसे लोगों की फितरत पे हँसता है

मुहब्बत में भी जो बस दे कभी उम्मीद ना रक्खे
साँप तन्हाई का उसको कभी मधुकर ना डसता है

शिशिर मधुकर

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/01/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/01/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 08/01/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/01/2019

Leave a Reply