पुरसार्थ

सपनो के तीर चलाने से कब भाग्य बदलने पाता हैं
पुरसार्थ की अग्नी मे तप कर ही , कोई शिकंदर बन पाता है
चलो उठो अब गूंज करो , कब तक सोच मे बैठोगे
तुम मे है सारी शक्ति ,तुम अपना भाग्य बदल दोगे

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/01/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 08/01/2019

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