इंसान का चेहरा – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

शैतान भी रहते हैं, इंसान का चेहरा में
हैवान भी सज जाते, दूल्हे का सेहरा में।

यहाँ गड़बड़ झाला है, करतूत भी काला है
कपटी भी घूम रहे, दाढ़ी वाला बकरा में।

यहाँ किसको कहें अच्छा, या बुरा कहें किसको
समझे अब हम कैसे, है पानी नहीं बदरा में।

यहाँ धोखे इतने हैं, अनोखे भी इतने हैं
विश्वास बदलता है, छलिया कोई पहरा में।

इंसाफ का है मोहताज, बिन्दु बेचारा आज
अब तक बैठा उदास, कुछ ठीक के आसरा में।

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