दुनियाँ की दस्तूर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

मुश्किल में आज फिर हम, ऐसे ही घिर गये हैं
नज़रों में आपके हम, फिर ऐसे ही गिर गये हैं।

हालात बदल गये या फिर, थे मजबूर इतने
इंसानियत के नाम हम, ऐसे ही फिर गये हैं ।

दुनियाँ के दस्तूर में, शराफत बहुत से देखे
अपने आप को हम, काठ सा ही चिर गये हैं।

अपने तकदीर की बात भी, कुछ नहीं अलग है
दूसरों की गलतियाँ भी, हमारे ही सिर गये हैं।

दिखला दूँगा जीतकर, मंजिल को अपने दम पर
हौसले को बुलंद कर, जंग में ही भिड़ गये हैं।

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