मुझको दिखा ओ रहगुजर, तेरे अन्दर हरा क्या है

मुझको दिखा ओ रहगुजर, तेरे अन्दर हरा क्या है
तू  मुश्किलों में  भी खड़ा, तेरे अन्दर  भरा क्या है

तुमसे बिछड़ के भी अभी तक, जो हम प्यार करते है
मुझको बताओ  फिर कि इन, दुआओं से बड़ा क्या है

जड़ के जमाने मे कभी, कि जिसको जीत कहता है
तू ही बता  मुझको  कि  अभी, मुझसे  लड़ा  क्या है

ये   जो  हमारी   हार   के,  ढिढोरें   खूब   पीटे  है
इससे उभरने का बता, कि अब वो मशवरा क्या है

ये जो पकड़ के बेफिजूल, सभी को ज्ञान देता है
मुझको  बता  तूने  कभी, खुद को  पढ़ा क्या  है

चालाक  नजरें,  हाथ  भी  कड़क,  पावँ  दबे  हूये
हमको बता भी दो कि अब, तुम्हारा मोहरा क्या है

माना  कि  दिल में  आपके , ये  सच  ईमान  बसता है
फिर ये बताओ दिल सतह पर, आपके खुरदरा क्या है

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

8 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 04/01/2019
  2. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 04/01/2019
  3. davendra87 davendra87 05/01/2019

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