साल अंग्रेजी – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

हमें तो कर विदाई भैया, मेरी अवधि अब पूरी
दे दिया जितना देना था , कुछ भी नहीं अधूरी।

अब आया साल नया है, कर उसकी तैयारी
किस्मत चाहे जो भी बोले , छोड़ ये लाचारी।

अंग्रेजी में साल बदलता, पर हिन्दी है मन सबका
होली खेल हम वर्ष बदलते,फिर काहे को भटका।

खुशी मनाना अलग बात है, लेकिन पर्दे में रहकर
रंग- ढंग अलग है उनका, ये समझाओ तूं कहकर।

अपना नया वर्ष जब आता, टेसू भी खिल जाते हैं
सरसो – तीसी – ज्वार बाजरा,गेहूं दाल घर आते हैं ।

हर किसान खुश हो जाता, होली जब है आती
हम मिलकर है रंग उड़ाते, यही तो अपनी थाती।

दुश्मन भी गले मिल जाते, सबके मन को भाते हैं
पूआ – पकवान खूब मिठाई, सब मिलके हम खाते हैं ।

हरे – हरे , नये पत्ते मिलते और फूलों से भर जाते हैं
महुआ-आम की मंजर लीची , खुशबू लेकर आते हैं ।

पपीहा बोले, मोर भी नाचे, विरह रंग दिखलाते हैं
वाह वसंती, हवा पवन की,यौवन रंग खिलाते है।

कहाँ ठहरेगा साल अंग्रेजी, हिन्दी ही रंग जमाता है
इसमें तो जाड़े की ठिठुरन, रंग में भंग मिलाता है।

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 04/01/2019
  2. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 04/01/2019

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