धरती का फेरा – शिशिर मधुकर ( बिना रदीफ की ग़ज़ल )

मुहब्बत तूने दी मुझको तभी मैं हो गया तेरा
तू आई मेरी बाहों में मिट गया सारा अँधेरा

जब से सूरज हुआ मद्धिम बशर देखा नहीं कोई
मगर उम्मीद थी दिल में फिर से होगा ये सवेरा

बहारें जब भी आती हैं शाख पे पात, उगते हैं
चहकते पंछियों का फिर वहाँ होता है बसेरा

अब तलक दिल की दुनिया में मैंने बस हार देखी है
यहाँ पे जो मिला मुझको वो था शातिर और लुटेरा

लाख कोशिश करी मैंने ना तुझसे वास्ता रक्खूं
मगर इस चाँद ने छोड़ा ना मधुकर धरती का फेरा

शिशिर मधुकर

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