शीत लहर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

जाड़े की ये मस्त धूप सुहानी
याद करा देती रातों को नानी।

शीत लहर की ये प्यारी बातें
थर – थर सी काँप रही ये रातें।

कितनी मुश्किल में हम हैं रहते
गरम कपड़ों में बदन हैं ढ़कते।

बच्चों – बूढ़ों पर आती शामत
दिखा जाती सर्दी ये कयामत।

स्वेटर मफलर काम ना आती
हाथ की ठिठुरन हमें सताती।

जगह – जगह ही अलाव जला है
सब गरीबों का करता भला है।

रात में ओस की ये जमती बूंदे
सबेरे सूरज में ये रिमझिम बूंदें।

गर्म चाय की हम चुस्की लेते
गर्म पकोड़े जब मुँख में देते।

नमी बनी रहती है अब इतनी
सोच भी नहीं सकते हैं जितनी।

  • हर मौसम का है खेल निराला
    माँ इन दिनों में हमें है संहाला।
  • कोहरे की चादर में हम लिपटे
    सर्द हवा में क्यों जीवन सिमटे।

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 26/12/2018

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