वक़्त जब इम्तहान लेता है

वक़्त जब इम्तहान लेता है ,
हर हक़ीकत को जान लेता है .
तोल लेता है पहले पर अपने ,
तब परिन्दा उड़ान लेता है.
भूख भड़की तो जान ले लेगी ,
लोभ लेकिन इमान लेता है .
फ़ैसला कर चुका है पहले ही ,
फिर भी मुन्सिफ़ बयान लेता है .
मैं उसे दोस्त कैसे कह दूं वो-
मेरी हर बात मान लेता है .
वो तमन्चे उठा नहीं सकता ,
हाथ में जो क़ुरान लेता है .

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