पूछ रहा मुझसे स्वदेश

पूछ रहा मुझसे हिमालय,पूछ रहा वैभव अशेष
पूछ रहा क्रांत गौरव भारत का, पूछ रहा तपा भग्नावशेष
अनंत निधियाँ कहाँ गयी,क्यों आज जल रहा तपोभूमि अवशेष;
कैसे लूटी महान सभ्यता प्राचीन,क्यों लुप्तप्राय वीरोचित मंगल उपदेश !
कितने कलियों का अन्त हुआ भयावह,कितने द्रोपदियों के खुले केश,
बता,कवि! कितनी मणियाँ लुटी,कितनों के लुटे संसृति-चीर विशेष !
चढ़ तुंग शैल शिखरों से देख!नहीं सौंदर्य बोध,विघटन के विविध क्लेश;
कहाँ विस्मृत धधकता स्फुलिंग दुर्धुर्ष, कहाँ कुपित काल विकराल शेष!
ज्ञान-विज्ञान अनुसंधान कहाँ गये,कहाँ लुप्त-विलीन अरूण ललाट श्लेष,
गंगा-यमुना-सिंधु की अमिय धार कहाँ,उद्दाम प्रीति बलिदान लेश,
कहाँ गये तप-तेज दिव्य तुम्हारे ,कहाँ प्रबुद्ध विभा तलवार वेष;
कहाँ अस्त ज्योतिर्मयी अनंत शिखायें,बता खंडित-वीरान कैसे हुआ स्वदेश?
ओ वीर-व्रती तु कहाँ छुपे हो, पल भर भी कर ले दृगुन्मेष;
ज्वालाओं से दग्ध विकल उलझन में,
तड़प रहा प्यारा स्वदेश ?

2 Comments

  1. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 23/12/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 24/12/2018

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