निश्छल प्रेम – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

जहाँ निश्छल प्रेम सदा रहता
जहाँ उज्ज्वल दीप सदा जलता।
उस परिपाटी का क्या कहना
सदियों की रीत जहाँ फलती।।

यहाँ वर्णित है संस्कारों का
यह भुगोल है उपकारों का।
यह गुणीजनों की थाती है
यहाँ धर्म – कर्म सरदारों का।।

यह धरती है बलिदानों की
होती यहाँ कद्र सम्मानों की।
यहाँ अमृत जल गंगा बहती
कीमत है जहाँ जुवानों की।।

यहाँ की मिट्टी – मिट्टी सोना है
हर पत्थर यहाँ सलोना है।
यहाँ वन उपवन है रखवाला
यहाँ पाप किये तो रोना है।।

उलझे को राह दिखाते हम
बिगड़े को सबक सिखाते हम।
भूखे को रोटी दे कर के
संग साथ खुशी मनाते हम।।

2 Comments

  1. shrija kumari shrija kumari 15/12/2018

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