आंखें नम नही करता

क्या करूँ  दिनभर, मन  नही  लगता
वो  तुम्हारा  फोन,  अब  नही  लगता
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ख्वाब अब  तो सारे, मर  से गये  है
दिल  अपनी बात, अब नही  करता
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मंदिर ओ मस्जिद  के, चक्कर  छूट गये
ख्वाइशें  पूरी  मेरी जो, रब  नही करता
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सच  कहते है  लोग, हद पार  कर दी है
करता  तो हूँ  लेकिन, सब  नही  करता
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मोहब्बत  का मजा,  उतरने  लगता  है
प्यार  से मगर  कोई, जब  नही  लड़ता
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देते है  अपने भी  दगा, वक्त  पर  लेकिन
आदत  हो गयी  इसलिए, गम  नही करता
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एक एक शब्द में तुम्हारी, सूरत दिखती थी
छुपा कर रखा तुम्हारा, वो खत नही पढ़ता
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दूर हो  तुम फिर  भी,आंखें नम  नही  करता
प्यार भी तुमसे लेकिन, कुछ कम नही करता

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 15/12/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 15/12/2018
  3. shrija kumari shrija kumari 15/12/2018
  4. sarvajit singh sarvajit singh 15/12/2018

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