दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

शिक्षा अब व्यवसाय का, पकड़ा
ऐसा रूप
जैसे नीर विहीन अब, सूख रहे सब कूप।

करती है गुमराह अब, नैतिकता की बात
कूटनीति की चाल भी , कर देती है घात।

दल बदलू नेता बने, पलड़ा भारी देख
उल्लू सीधा कर रहे,बनके चिल्ली शेख ।

कम – ज्यदा की चाह में, उलझे ऐसे लोग
मन में लालच भर लिये, लगी बुरी ये रोग।

सोने की लंका जली, और जला गुमान
इससे रावण डर गया, रहा कहाँ अनुमान।

सीता राम कपीश के, कर ले मन में जाप
रोग संकट हटा रहे, मिट जाये सब पाप ।

शिक्षक शिष्य के बीच में ,रहा कहाँ अब मेल
बढ़ी बीच की दूरियाँ, अजब- गजब है खेल।

4 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 12/12/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 12/12/2018
  3. sarvajit singh sarvajit singh 12/12/2018
  4. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 12/12/2018

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