शजर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

शजर एक विशाल खड़ा है
हर पत्ता उसका बेटा है
अटल अडिग हिमालय सा वह
खड़ा रहकर भी लेटा है।

जड़ सजल धरती के नीचे
खुला आकाश है ऊपर
चेतन उसके अंदर बसता
रग रग में छुपा है हूनर।

डाली डाली अंग है उसका
तना कितनी निराली है
जड़ के ऊपर धड़ है उसका
हर सखा संगी प्यारी है।

हर पत्ता ही सौर्य है उसका
फूल फल प्यारे प्यारे
कितना सकून सब को देता
छाँव देखो न्यारे न्यारे।

हम सब की सेवा करता है
फल देता मीठा मीठा
फिर भी काट देते उसको
कर देते हैं हम पीठा।

आँधी और तुफान से लड़ता
धूप ताप सब सहता हूँ
हर मौशम को जानता हूँ मैं
फिर भी खड़ा रहता हूँ।

पत्ते उसके सब झड़ जाते हैं
टहनी भी टूट जाती है
इसका भी गम नहीं है थोड़ा
सुख दुख सा वो साथी है।

नंगा बदन पतझड़ में होता
वसंत हमे सजाता है।
फूल फल जब इसमें लगते
पकते फल हंसाता है।

शजर – पेड़ – वृक्ष

4 Comments

  1. arun kumar jha arun kumar jha 09/12/2018
  2. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 10/12/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 10/12/2018
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 12/12/2018

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