धीरे-धीरे ।

जीने की तमन्ना, रूठ रही है, धीरे-धीरे..!
ये रूह भी तन से, ऊब रही है, धीरे-धीरे..!
समझाती है सांसें उनको, जी-जान से मगर,
सांसें भी तो देखो, टूट रही है, धीरे-धीरे..!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०५-१२-२०१८.

5 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 06/12/2018
    • Markand Dave Markand Dave 07/12/2018
  2. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 06/12/2018
    • Markand Dave Markand Dave 07/12/2018
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/12/2018

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