याचक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

याचक हूँ मांगता द्वार द्वार
करता हूँ विनती बार बार।
कोई रहम करे बस सोचता
मैं अपने आप पर कोशता।

मैं इसी वतन का साथी हूँ
जलता मद्धिम सा बाती हूँ।
यहाँ मेरा कोई वजूद नहीं
मैं हूँ किसी का विरुद्ध नहीं।

अपना पराया किसे कहे हम
विपदा अपनी कैसे सहे हम।
हम दुखियों का कौन सहारा
भटका फिरता हूँ हारा मारा।

मंदिर मस्जिद है ठौर ठिकाना
हाथ कटोरा है जाना पहचाना।
दाता दानी नहीं कोई दिखता
मदद करने कोई ना सिखता।

कभी खाता कभी भूखे सोता
अपने किस्मत पर अपने रोता।
आधा अधूरा है तन पर कपड़ा
हर मौशम ने उनको है जकड़ा।

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 03/12/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 03/12/2018

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