भिक्षुक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

भूखा बिलकुल शांत
कभी उठता कभी गिरता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

घर बार नहीं मेरा
यहाँ वहाँ भटकता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

हर बार ही ठोकर खाता हूँ
कभी खाली कभी कुछ पाता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

हर मौसम का मारा हूँ
गिड़गिडा़ता पैर पर गिरता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

मांग कर ही तो खाता हूँ
दिन रात सिसकता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

दुनिया में ना मेरा कोई
रिश्ता हर पल करता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

दया धर्म अब कौन है करता
नित दिन ऐसे जलता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

ताकत नहीं लड़ने का हममे
हर बार ही फिसलता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

जितना मिलता उससे ज्यादा
हर बार दुआएं करता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

पेट पीठ में सट है जाता
उम्र बीस में झुकता हूँ
भिक्षुक हूँ
मारा मारा फिरता हूँ।

4 Comments

  1. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 02/12/2018
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 03/12/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 03/12/2018
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 03/12/2018

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