कोई ऐसा नहीं – शिशिर मधुकर

कोई ऐसा नहीं मन की मैं जिससे बात सब कर लूँ
किसी को प्यार से चुमूँ और बाहों में फिर से भर लूँ

मुझे तो अब समझ आती नहीं है राह मंजिल की
अगर कोई सुझाए रास्ता मैं भी चुन के नेक घर लूँ

ज़िंदगी को जुआ समझा और सब वक्त पे छोड़ा
अगर मौका मिले फिर से मैं भी पहले हर ख़बर लूँ

चील को मोरनी समझा और हथियार हर इक छोड़ा
समझ न आए अब मुझको किस विधि काट मैं पर लूँ

किसी को भेज दे मौला दवा मरहम तू अब ले के
अपनी चोटों की पीड़ा से मैं भी मधुकर कुछ उबर लूँ

शिशिर मधुकर

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