धूप देखो तो ना खिली – शिशिर मधुकर (बिना रदीफ की ग़ज़ल )

लाख ढूंढा किया फिर भी मुहब्बत मुझको ना मिली
रात गुजरी है दिन निकला धूप देखो तो ना खिली

घाव देता रहा जो भी मिला उल्फ़त की राहों में
ना मरहम मिला कोई चोट अब तक ना वो सिली

किसी ने आज फिर खुद के लिए तोड़ा है नाजुक दिल
तभी तूफान आया है और जमीं नाराज़ हो हिली

मुहब्बत के बिना जीना कोई जीना नहीं होता
वो ही सरताज है जिसको मिला साथी यहाँ दिली

फूलों की राह पे चलकर गुमां वो खुद पे करता है
क्या जाने पीर वो मधुकर खाल पैरों की जो ना छिली

शिशिर मधुकर

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 15/11/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/11/2018

Leave a Reply