ग़ज़ल

आना क़ज़ा का लाज़मी |
कर मिन्नतें या बंदगी |

जब भी दग़ा साँसे करें |
हो ख़ाक जाये जिंदगी ||

जाना सभी ने बारी से |
मेहमाँ जहां में आदमी ||

सब छोड़ जायेगा यहीं |
जो भी कमाया आदमी ||

जी जिंदगी हँस कर जरा |
ये ख़ाक कल भी आज भी ||

क्यों तू क़ज़ा से अब डरे ||
जाना “मनी” है लाजमी ||

मनिंदर सिंह “मनी”

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 15/11/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/11/2018

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